How Mi air charger technology work? || Is Mi Air Charge harmful to health? || Is there other technology like mi air charger technology?

How Mi air charger technology work? In Hindi

 

mi air charger

Xiaomi के अनुसार, इस डिवाइस में 5 अलग अलग तरह के एंटेना लगे हुए है जब भी आप रूम में एंटर करेगे तो वो आप के फोन की एक्यूरेट लोकेशन डिटेक्ट कर के लाइट को millimetre-wide waves में कन्वर्ट कर के beamforming technique से आप के तक भेजेगा।  beamforming technique को सिम्पल शब्दो मे कहे तो वो चार्जर के द्वारा बनाए गए magnetic field को चारो ओर फैलाने की बजाय वो सिर्फ आप के फोन तक ही भेजेगा। जिस से ऊर्जा का बिगाड़ काम हो और efficiency भी बनी रहे। mi air charger in Hindi.

इसी तरह आप के फोन में भी 2 तरह के एंटेना लगे हुवे होगे। एक आप को exact location चार्जर तक भेजेगा और दूसरा उस millimetre waves को वापिस आप के फोन में electric energy में कन्वर्ट करे गा।

पर इस के साथ एक सवाल ये भी होता है कि इस चार्जर का रेडियेशन कहीं हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो नहीं है ना?

Is Mi Air Charge harmful to health?


तो देखा जय तो millimetre waves non-ionizing radiation की कैटेगरी में अति है। रेडिएशन को मुख्यत 2 केटेगरी में डिवाइस किया गया है, ionizing radiation और non-ionizing radiation. ionizing में x-ray, gamma rays, और अन्य radioactive materials का समावेश किया जाता है। जो human cells में मुटेशन कर के कैंसर जैसी बीमारियां पैदा कर सकता है। इस के अलावा सूरज से आरहा ultraviolet radiation भी आप के cells में मुटेशन कर के कैंसर जैसी बीमारियां पैदा कर सकता है। इसी लिए तो कहते है जब भी ultraviolet radiation index हाई हो तो sunscreen लाए बग़ैर बाहर ना जाना चाहिए।

पर millimetre waves non-ionizing radiation की कैटेगरी में अति है। इस लिए इस radiationमें इतनी ताकत नहीं है कि वो सीधे cell को नुकसान पहुंचा सकें। 

other technology like mi air charger technology

बाकी और भी कई सारी कंपनिया इस तरह की technology पर काम कर रही है। Xiaomi के अलावा witricity नाम कि कम्पनी भी इस पर काम कर रही है, साथ में Motorola ने भी विडियो जारी कर के बताया कि वो भी इस टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे है।

वैसे देखा जाए तो इस तरह की technology कोई नई नहीं है, इस के अलावा और भी कई सारी तकनीके है जिस से wirelessly ऊर्जा को transfer किया जा सकता है। 1891 महान वैज्ञानिक Nikola Tesla टेस्ला ने भी कुछ इसी तरह का उपकरण बनाया था Tesla coil नाम से, टेस्ला कॉइल high-frequency transformer करने में सक्षम है। low current पर हाई वोल्टेज बना ने में भी सक्षम है। कई लोग इनको evil scientist भी कहते है पता नहीं क्यों और किताबों में भी इनका जिक्र बहुत कम आता है। इनके और भी कई सारे invention है, वो पूरी दुनिया में वायरलेस बिजली पहुंचना चाहते थे। जिस केलिए एक बहुत बड़ा टावर भी बनता है। और उस वक्त पता नहीं क्यों इन किसी ने इस invention कि अहमियत नहीं कि और टावर को भी तोड़ दिया गया।

ख़ैर आज हमारे पास और भी कई तरी के है जिस से वायरलेसली ऊर्जा को ट्रांसमिट किया जा सकता है।

पहला  मैग्नेटिक फिल्ड की मदद से जो आज-कल हम मोबाइल ओर cars में देखते है, वायरलेस चार्जर के तौर पे। इन में charging pad ओर चार्ज होने वाले डिवाइस में एक इलेक्ट्रिक वायार कि coil लगी हुई होती है। जब भी इस pad को बिजली के साथ कनेक्ट किया जाता है तो वो इस coil कि मदद से एक मैग्नेटिक फिल्ड बनता है। और जब भी दूसरे coil को इसके पास लिया जाता है तो वह अपने आप ऊर्जा का ट्रांसलेट करने लगता है। पर इस तरह की टेक्नोलॉजी में एक प्रॉब्लम है, चार्जिंग पेट से अगर उसकी दूरी बढ़ जाए तो वह चार्ज नहीं कर पाएगा। जिससे एक ट्रू वॉयरलैस एक्सपीरियंस नहीं मिलता।

पर इस टेक्नोलॉजी में कुछ मॉडिफिकेशन कर कर इसकी दुरी बढ़ाई जा सकती है कुछ मीटर तक, अगर इसमें Resenant circuit introduce करा दी जाए तो इससे इसकी रेंज बड़ाई जा सकती है। जैसे Xiaomi और अन्य कंपनी ने किया। दरअसल इस में coils को एक specific resonance frequency में oscillate किया जाता है, जिस से इस कि रेंज कई मीटर तक बढ़ जाती है। सिम्पल शब्दो मे कहे तो लाइट को waves कन्वर्ट कर के किसी एक specific frequency पे छोड़ दिया जाए। पर इस तरह की टेक्नोलजीज से ज्यादा से ज्यादा एक रूम तक ही लाइट को transmit किए जा सकता है।

पर अब में जिस technology के बारे में बताने जा रहा हूं उस से बिजली को space तक भी transmit किया जा सकता है। दोस्तो आज की डेट में इस तरह का कांड करने के लिए हमारे पास दो तरह की टेक्नोलॉजी अवेलेबल है। जिसमें से पहली है माइक्रोवेव।

दोस्तों माइक्रोवेव इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स होती है, इस तरह की टेक्नोलॉजी में हम लोग इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव के फोम में ही इलेक्ट्रिक एनर्जी को ट्रांसमिट करते हैं। जिसे इस तरह की टेक्नोलॉजी से हम स्पेस से अर्थ तक और अर्थ से स्पेस तक लाइट को ट्रांसमिट कर सकते हैं। लेकिन इस तरह की टेक्नोलॉजी को हम नॉर्मल लाइफ में इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि इसका जो रेडिएशन होता है वो humans और बाकी लिविंग organism के लिए हार्मफुल होता है।

और इसी कैटेगरी में दूसरी टेक्नोलॉजी आती है लेजर, दोस्तों इस technology में बहुत ही पावरफुल लेसर का इस्तेमाल किया जाता है। जिस को photovoltaic receiver पर पोइंट किया जाता है। ये रिसीवर दिखने मे solar cell जैसे ही होते है। पर असल में इनको leser कि wavelenth के हिसाब से tune किया जाता है। पर बदकिस्मती से इस कॉपी इस्तेमाल हम नॉर्मल लाइफ में नहीं कर सकते। क्योंकि इसके रेडिशन भी बहुत खतरनाक होते हैं।

बाकी इस तरह की टेक्नोलॉजी पर रिसर्च चल रहा है क्या पता भविष्य में कौन सी टेक्नोलॉजी आ जाए।

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